Wednesday, 30 October 2013

तेरे इश्क मे करतब कर लेता हूँ
अलमस्त ख्वाबों मे,
खुशियाँ गढ़ लेता हूँ

सुबह के कलरव मे
तेरे प्रेम की अनछुई पगडंडी पर
निर्विध्न चल लेता हूँ

अमावस के घुप्प अँधियारे मे भी
तेरी मुस्कुराहट के तमाम
उन लफ्जों को पढ़ लेता हूँ

नेमतों की शालीनता मे रह कर
सम्बन्धों के विस्तार को
व्यवहारिकता मे गढ़ लेता हूँ

लोहित कंठों के मृदुलता मे
स्वर के स्नेहिलता मे
प्रेम के पल्लवन मे
कई आखर चढ़ लेता हूँ

तेरे इश्क मे करतब कर लेता हूँ
अलमस्त ख्वाबों मे
खुशियाँ गढ़ लेता हूँ

गुनेश्वर

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