अर्थ की लालसा मे
अनर्थ का तांडव हो रहा है
ये समन्दर और भी गहरा हो रहा है
माँ हाँथों से भात परोसती थी
हाइजीन की निगोड़ी सभ्यता
काँच स्टील की चमचों मे खो रहा है
श्र्द्धा मे सात्विक्ता नहीं
सहज सी मानवीयता भी कहीं नहीं
स्वार्थ की पगडंडी और कांटे बो रहा है
ये फितरती फंगस भी कहाँ धो रहा है
अर्थ की लालसा मे
अनर्थ का तांडव हो रहा है
गुनेश्वर
अनर्थ का तांडव हो रहा है
ये समन्दर और भी गहरा हो रहा है
माँ हाँथों से भात परोसती थी
हाइजीन की निगोड़ी सभ्यता
काँच स्टील की चमचों मे खो रहा है
श्र्द्धा मे सात्विक्ता नहीं
सहज सी मानवीयता भी कहीं नहीं
स्वार्थ की पगडंडी और कांटे बो रहा है
ये फितरती फंगस भी कहाँ धो रहा है
अर्थ की लालसा मे
अनर्थ का तांडव हो रहा है
गुनेश्वर
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