Wednesday, 30 October 2013

आज बेटी दिवस पर

माँ इस धरा पर तुमने लाया मुझको
ममता से अपना दूध पिलाया मुझको
ज्ञान भी तुमने ही सिखलाया मुझको
सामाजिकता भी तो बतलाया मुझको

माँ तुमने बचपन से योवन तक पहुँचाया मुझको
सुंदर सी अर्धाग्नी भी तुमने ही दिलवाया मुझको

माँ वह भी नारी है और तुम भी नारी
वह भी किसी की बेटी तुम भी बेटी हो
क्यों कहती हो उसने मुझे छीन लिया
जबकि तुमने ही तो मुझे चुन के दिया

किताबों में पढ़ा हूँ
बड़ों से भी सुना हूँ
बच्चे के लिए माँ
पूरी जिन्दगी लुटा
देती है ,, प्रेम से
रहना सिखा देती है

माँ आज एक बात मुझे कहनी है
अंतस की श्रद्धा चरणों में बहनी है

माँ अपने प्यार की पुरवाई थोड़ा
उसको भी तुम दे दो न
संबंधों के इस अरुणिम को
शालीनता की सीपी में भर दो न
मैं तो तुम्हारे मन का मोती हूँ ही
वह बेटी भी मनमोती बन जायेगी
अपने घर से लाये संस्कारों से भी
तुम्हे रिझाएगी, सभ्यता की पालकी में
खुश खुश हो कर ही आएगी

फिर मेर भी बंट जाने का प्रश्न कहाँ आएगा
मेरी पूर्णिमा का चंचलपन तुमको जो भायेगा
गुनेश्वर

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