Wednesday, 30 October 2013

तुम खामोश रहने लगे हो
दहेज की कमी से

और मैं अपने माँ बाप को
छोड़ आई हूँ
अपनी खुशियों की पराकाष्ठा का चलचित्र दिखा कर

यदि तुम्हें लगता है
अर्थ , ज्यादा जरूरी है
मेरी ज़िम्मेदारी तुम्हारी कोई मजबूरी है

बेशक बेझिझक चले जाओ
माँ बाप ने
इतना तो कर ही दिया था

ज्ञान की कुंजी
शिक्षा की पूंजी
मुझे समय रहते दिला दिया |||||
और मैं स्वाभिमानी हूँ ,, निसंदेह

इसलिए
तुम्हारी जूतों की नोक पर

न बाबा न

चाहो तो तुम मेरे साथ रह सकते हो
मैं तुम्हें पाल लूँगी

बशर्ते तुम्हारे ""मैं""" की मौत न हो जाये

ओहो ----------मैं तो भूल ही गई

तुममे """मैं """ बचा ही कहाँ है

चलो घर चलो ,,, कल से तुम मेरी सहज और शालिन ज़िम्मेदारी हो
तुम्हारी सामाजिक पत्नी ,,, खुले मन से न्योता है
कोई डिमांड नहीं है मेरा

आओ चलते क्या ?????
गुनेश्वर

No comments:

Post a Comment