Wednesday, 30 October 2013


दीपों की इस देहरी पर
संभावनाओं की मैं फुलवारी रख दूँ
मनन मौन न हो जाए
अंतस मे फूलों की क्यारी रख दूँ

सभ्यता के इस ठिठुरन मे
भूली बिसरी यादों की थारी रख दूँ
परवश न होने पाये संस्कृति
सांस्कृतिक सौम्यता प्यारी रख दूँ

स्नेह की बांसुरी हो अन्दर
सुदामा सी मित्रता संग सारी रख दूँ
रोशन रहे गीतों से जग सारा
मयूर का नर्तन हरदम जारी रख दूँ

हरीतिमा न हो लुप्त कभी
वरुण से कह हरदम बदरा कारी रख दूँ
अर्थ व्यवस्था व्यवहारिक हो
सम्पूर्ण सृष्टि मे इसके तैयारी रख दूँ

प्रेम पलुहना होता रहे
ओस सा निर्मल मन और खुद्दारी रख दूँ
दीपशिखा के करतल पर
ॐ से रिसता रून-झुन बारी बारी रख दूँ
.............
दीपों की इस देहरी पर
संभावनाओं की मैं फुलवारी रख दूँ

गुनेश्वर

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