अन्तोत्गात्व जीवित होने का भ्रम पाल रहे हैं
काल-कलवित अंतस है पर हम टाल रहे हैं
वैचारिक मानसिकता में विद्वता नहीं है अब
व्यभिचारिता में
मुक्तभाव-मुक्तक से परे
कौम कहाँ कमजर्फ है
इन्सान ही खुदगर्ज है
मजहब शालीन होता है
हमारे रिश्तों में गर्द है
गुनेश्वर
मुक्तभाव-मुक्तक से परे
किस जुल्म की मुझे सजा दे रहे हो
जनता हूँ धीरे से मुझे मिटा दे रहे हो
एक बार कहते तो खुद हट जाता मैं
इसके लिए दोस्ती ही लुटा दे रहे हो
गुनेश्वर
कुछ शब्द थिरकते हैं
कई जिन्दगी बनते हैं
संघर्ष संदर्भित होता
उनके हाँथों में किताब रखा था
प्यार उसमे बेहिसाब रखा था
दंगों ने जला दिया जिस्मों-जाँ
काल-कलवित अंतस है पर हम टाल रहे हैं
वैचारिक मानसिकता में विद्वता नहीं है अब
व्यभिचारिता में
मुक्तभाव-मुक्तक से परे
कौम कहाँ कमजर्फ है
इन्सान ही खुदगर्ज है
मजहब शालीन होता है
हमारे रिश्तों में गर्द है
गुनेश्वर
मुक्तभाव-मुक्तक से परे
किस जुल्म की मुझे सजा दे रहे हो
जनता हूँ धीरे से मुझे मिटा दे रहे हो
एक बार कहते तो खुद हट जाता मैं
इसके लिए दोस्ती ही लुटा दे रहे हो
गुनेश्वर
कुछ शब्द थिरकते हैं
कई जिन्दगी बनते हैं
संघर्ष संदर्भित होता
उनके हाँथों में किताब रखा था
प्यार उसमे बेहिसाब रखा था
दंगों ने जला दिया जिस्मों-जाँ
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