Wednesday, 30 October 2013

तुम ऐसे ही
सपनों की सीमाओं मे
आते जाते रहते हो
विरह की इन वीथियों मे
कैसे तुम मुस्कुराते रहते हो
दर्द के बिछौने पर चाहा सो जाऊँ
भूली बिसरी यादों के
रंग बिरंगे चित्र सजाते रहते हो
सम्बन्धों के अरुणीम का वह
दिवास्वप्न जब जब टूटा है
कोमलता से मेरे मन के
घावों को सहलाते रहते हो
निर्मलता के मनभावन गीत
सुनाते रहते हो
तुम ऐसे ही सपनों की सीमाओं मे
आते जाते रहते हो
कल कल करती जलधारा मे
ठंडक का एहसास दिलाते रहते हो
स्नेह की लतिकाओं मे
मुझको तो तुम लिपटाते रहते हो
जब जब सपनों से शून्य मे
जाने की कोशिश करता हूँ
तब-तब तुम हँस-हँस कर
ॐ का झंकार सुनाते रहते हो
क्या तुम
ऐसे ही सपनों की सीमाओं मे
आते जाते रहते हो

गुनेश्वर

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