व्यथा एक बुजुर्ग की
कासे कहूँ ,कैसे कहूँ मन का रोद्र रूप तन कुह्म्लाया सा
सिमटा सा तन मन भरमाया सा
अंक पाश में भर, कमलिन की बाँहे
छू मंतर हो जा कह जाएँ ऐसी जुबान लिए
""जो मेरे अपने""
सहमा सहमा हूँ बोझिल पलकों में एक आस लिए
सुख चूका अंदर का आवेग,,बच्चे सा मन हुआ जा रहा
पर मेरे उम्र दराज बचपन को क्यों वात्सल्य नहीं ,,,
बचपन तो हेय नहीं बच्चों का,,
फिर मेरा यह बचपन क्यूँ हेय हुआ
कैसे मानु, मैं गुरु न बन सका, उनके बचपन का
कैसे मानु, मैंने जो दिया, वो कमतर था
मन का रोद्र रूप तन कुह्म्लाया सा
सिमटा सा तन मन भरमाया सा
खुली खुली बांहों में मैंने उनका बचपन जिया
पकड़ उगलियाँ उनकी मंदिर मस्जिद की देहलीज़ छुआ
दिया हर उत्तर उनकी नन्ही बातों का
कई बार उन्होंने अपनी झूठी बातों पर
" माँ कसम",कहा
और मैंने उसे भी चुपचाप सहा
Guneshwar
।।मेरी लाज रख लेना बच्चों ।।
बूढी हड्डियों की ठिठुरन
अब और नहीं सही जाती
तुम्हारी उँगलियों की
कमी महसूस होती है
माँ भी देहरी पर बैठी बैठी
तकती है और देखती है
कंही दूर चौपाल से उठते धुल
मैं किसी गाड़ी की आवाज
पल्लू माथे पर रख, पलट जाती है घर अंदर
दिए बाती का टेम जो हो गया
अब आटा गुंथा नहीं जाता
आजकल चिला ही बना देती है
रात भर मेरा हाथ थामे मुझे दिलासा देती है
साथ साथ चलेंगे कंही भी
एक डर सा बैठ गया है और उसका डर मुझे
सुनाई देने लगा है ।
"पता नहीं कब"
यदि! मेरे बाद ---------?
मेरी लाज रख लेना बच्चों
गुनेश्वर
कासे कहूँ ,कैसे कहूँ मन का रोद्र रूप तन कुह्म्लाया सा
सिमटा सा तन मन भरमाया सा
अंक पाश में भर, कमलिन की बाँहे
छू मंतर हो जा कह जाएँ ऐसी जुबान लिए
""जो मेरे अपने""
सहमा सहमा हूँ बोझिल पलकों में एक आस लिए
सुख चूका अंदर का आवेग,,बच्चे सा मन हुआ जा रहा
पर मेरे उम्र दराज बचपन को क्यों वात्सल्य नहीं ,,,
बचपन तो हेय नहीं बच्चों का,,
फिर मेरा यह बचपन क्यूँ हेय हुआ
कैसे मानु, मैं गुरु न बन सका, उनके बचपन का
कैसे मानु, मैंने जो दिया, वो कमतर था
मन का रोद्र रूप तन कुह्म्लाया सा
सिमटा सा तन मन भरमाया सा
खुली खुली बांहों में मैंने उनका बचपन जिया
पकड़ उगलियाँ उनकी मंदिर मस्जिद की देहलीज़ छुआ
दिया हर उत्तर उनकी नन्ही बातों का
कई बार उन्होंने अपनी झूठी बातों पर
" माँ कसम",कहा
और मैंने उसे भी चुपचाप सहा
Guneshwar
।।मेरी लाज रख लेना बच्चों ।।
बूढी हड्डियों की ठिठुरन
अब और नहीं सही जाती
तुम्हारी उँगलियों की
कमी महसूस होती है
माँ भी देहरी पर बैठी बैठी
तकती है और देखती है
कंही दूर चौपाल से उठते धुल
मैं किसी गाड़ी की आवाज
पल्लू माथे पर रख, पलट जाती है घर अंदर
दिए बाती का टेम जो हो गया
अब आटा गुंथा नहीं जाता
आजकल चिला ही बना देती है
रात भर मेरा हाथ थामे मुझे दिलासा देती है
साथ साथ चलेंगे कंही भी
एक डर सा बैठ गया है और उसका डर मुझे
सुनाई देने लगा है ।
"पता नहीं कब"
यदि! मेरे बाद ---------?
मेरी लाज रख लेना बच्चों
गुनेश्वर
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