शीर्षक जश्न/त्यौहार/ उत्सव
आदरणीया सीमा अग्रवाल जी को समर्पित
कभी रुक कर खोजना मुझे
जिस्मों की भीड़ मे
मैं सार्थक हो जाऊँगा
कभी दिखूँगा ,,
नग्न पीठ पर
पेट को ढोता
..................और कभी
कचोड़ी का आधा हिस्सा तलाशते
गारबेज की तलहटी मे ,,,, सर ढुकाए
और तब तुम अन्तर करना
अपने अपने होने का जीने का
उठाना रेत मुट्ठी मे
तुम्हें महसूस होगा रेत
फिसलता हुआ,,,,,,,,,,,
कुछ पादचापों से रौंदे जाने के लिए
और मैं सार्थक हो जाऊँगा
वक्त मुझे इसी तरह सार्थक करती है
मेरा घर हर वक्त
रौशनी में होता है
गाड़ियों की हेड लाइट
सभी दिशाओं से,,,,,और
मेरे बच्चे इसी तरह रोज
जश्न मना लेते हैं
चकाचौंध और मेरे बच्चे जी लेते है
फुटपातों मे गत्ते का चादर ओढ़े
घुटने नहीं छीलते उनके
पेट का मखमली स्पर्श
मिलता है हमेशा हमेशा इसी तरह जश्न
कभी रुक कर खोजना मुझे
जिस्मों की भीड़ मे
मैं सार्थक हो जाऊँगा
गुनेश्वर
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