सभ्यता की नियत बदली है या
सत्य परवश के पराक्रम पर
निर्भर करता है
मंतव्य की सारगर्भिता पर
मातम की सरगोशी है और
इरादों के इर्दगिर्द कोहरा घना
सप्तपदी दुविधा के दर्पण में
संघर्षो का सन्दर्भ झेल रही
मंगल गान, तीन गांठों की
आपूर्ति नहीं कर पाता अब
सहभागी है पर कुटुंब नहीं
व्यभिचार की रूप-रेखा बदली
बच्चा,उफ्फ,किलसाता है मन
सप्तपदी कोने में दुबकी बैठी
खुरचन भी न बच पायेगा
संस्कृति का, सभ्यता का
सहजता का निश्छलता का
भ्रमण कर रहा है शख्स
भ्रमित मंतव्य, बिखरा सा
सच लिए
शायद के वशीभूत ?????
गुनेश्वर
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