Tuesday, 10 September 2013



सभ्यता की नियत बदली है या
सत्य परवश के पराक्रम पर
निर्भर करता है

मंतव्य की सारगर्भिता पर
मातम की सरगोशी है और
इरादों के इर्दगिर्द कोहरा घना


सप्तपदी दुविधा के दर्पण में
संघर्षो का सन्दर्भ झेल रही


मंगल गान, तीन गांठों की
आपूर्ति नहीं कर पाता अब
सहभागी है पर कुटुंब नहीं
व्यभिचार की रूप-रेखा बदली

बच्चा,उफ्फ,किलसाता है मन
सप्तपदी कोने में दुबकी बैठी

खुरचन भी न बच पायेगा
संस्कृति का, सभ्यता का
सहजता का निश्छलता का

भ्रमण कर रहा है शख्स
भ्रमित मंतव्य, बिखरा सा
सच लिए

शायद के वशीभूत ?????
 
गुनेश्वर




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