रिश्तों के रास्ते संकीर्ण होने लगे हैं
ये कैसा पलायन है
जंहा अपने , अपनों को खोने लगे हैं
हम दो हमारे दो तक का
शिलालेख तो ठीक है ।
लेकिन
घर की सात्विकता का सत्व
सहृदय नहीं लगता
पर मकान कई कई मंजिलों
के होने लगे है।
हमसे पहले , और उनसे पहले
वसुदेव कुटम्बकम के अहसासों
में सांसे लेते थे
पर हम और हमारे बाद
अपने ही परिवेश में
परवश होने लगे है
रिश्तों के रास्ते संकीर्ण होने लगे .......
गुनेश्वर
ये कैसा पलायन है
जंहा अपने , अपनों को खोने लगे हैं
हम दो हमारे दो तक का
शिलालेख तो ठीक है ।
लेकिन
घर की सात्विकता का सत्व
सहृदय नहीं लगता
पर मकान कई कई मंजिलों
के होने लगे है।
हमसे पहले , और उनसे पहले
वसुदेव कुटम्बकम के अहसासों
में सांसे लेते थे
पर हम और हमारे बाद
अपने ही परिवेश में
परवश होने लगे है
रिश्तों के रास्ते संकीर्ण होने लगे .......
गुनेश्वर
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