Monday, 1 July 2013

स्नेहिल शब्दो की झंकृत वाणी

स्नेहिल शब्दो की झंकृत वाणी
मृदुल होता मधुमास
तुमने ये कैसा आलिंगन दिया, की!
उफ़्फ़..............

ताम्रपत्र पर चित्रांकित कर
सहेज रख्खा मन
और मैंने जाना तन मन का रस

श्रिंगार यह कैसा किया तुमने, की !
उफ़्फ़................

स्नेहिल शब्दो का यह श्रिंगार
प्रत्यंक्षा चढ़ा रख्खा अंग-अंग, की !
उफ़्फ़

मेरे अंतस के कोने
रसिकता से लमपट हुए जा रहे
मृदुल होता मधुमास, की !
उफ़्फ़..............

मन मयूर नाच उठठा
वाह ये कैसा एहसास
वाह ये कैसा मधुमास
वाह ये कैसी आस
वाह यह कैसा आलिंगन
वाह ये कैसा श्रिंगार
वाह ये कैसा प्यार,
की उफ़्फ़, की उफ़्फ़, की उफ़्फ़

गुनेश्वर

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