वो सखी जब भी खामोश होती है
प्रेम की खुमारी मे हमे डुबोती है
हाँथ पकड़ती, खींचती, बुलाती है
बे-आवाज पलकों को सहलाती है
कोरों पर सुरमई स्वप्न सजाती है
... कहती है बतलाओ वो सारी बातें
अमराई के नीचे किलोल करते थे
तुम और मैं, वो महुवे की खुशबू
डूमर का पकना स्वाद का चखना
वो फुगड़ी का खेल,मुहब्बत का मेल
पोश्म-पा का रंग वो क्षणिक आवेश
और जंग वो कुहुक की आवाज वो
मेहंदी का पीसना हाथों मे सजना
माँ से मनुहार रोटी की कोरों का
उपहार ----------------------------
हम कब बड़ी हो गईं पता न चला
क्या वाकई हम बड़ी हो गईं
हमारे सामने अनजानी सी मंजिल
जाने कब खड़ी हो गई
आओ बच्चो मेरा बचपन मुझे लौटा
दो :::: पोषम पा भाई पोषम पा
पोषम पा भाई पोषम पा ,,,
नम सी हो रहीं हैं पलकें, चल हट
मुझे अब जाने दो , जाने दो ”””
गुनेश्वर
प्रेम की खुमारी मे हमे डुबोती है
हाँथ पकड़ती, खींचती, बुलाती है
बे-आवाज पलकों को सहलाती है
कोरों पर सुरमई स्वप्न सजाती है
... कहती है बतलाओ वो सारी बातें
अमराई के नीचे किलोल करते थे
तुम और मैं, वो महुवे की खुशबू
डूमर का पकना स्वाद का चखना
वो फुगड़ी का खेल,मुहब्बत का मेल
पोश्म-पा का रंग वो क्षणिक आवेश
और जंग वो कुहुक की आवाज वो
मेहंदी का पीसना हाथों मे सजना
माँ से मनुहार रोटी की कोरों का
उपहार ----------------------------
हम कब बड़ी हो गईं पता न चला
क्या वाकई हम बड़ी हो गईं
हमारे सामने अनजानी सी मंजिल
जाने कब खड़ी हो गई
आओ बच्चो मेरा बचपन मुझे लौटा
दो :::: पोषम पा भाई पोषम पा
पोषम पा भाई पोषम पा ,,,
नम सी हो रहीं हैं पलकें, चल हट
मुझे अब जाने दो , जाने दो ”””
गुनेश्वर
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