Monday, 1 July 2013

खामोश रह बदतमीज

खुशनुमा शाम हाथों मैं जाम
पीने के लिए बहुत सारे गम

जीने की तमन्ना ने जीने न दिया
रुखसत कर दिया हमे मैखाने से
एक जाम भी हमे पीने न दिया

ये कैसी तक्कलुफ की दोस्तों ने
सारे गम खुद ही पी गए और
यह कह गए
खामोश रह बदतमीज
हमारी बराबरी करेगा क्या

क्या दोस्ती पायी है
बेमुर्रब्बतों ने सरे आम हंसी उड़ाई है|
उन्हे क्या बताएं गमे आरजूओं की फेहरिस्त

पगलों ने जाम कम न पड़ जाए
हमे पतली गली दिखाई है |||

  गुनेश्वर

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