Monday, 1 July 2013

कुछ रिश्तों की फरमाइश थी

कुछ रिश्तों की फरमाइश थी
कुछ गैरो की आजमाइश
मैंने वाकया कुछ और कहा
उसने बयां कुछ और किया

सोचा था सँभल जाएगी जिंदिगी
रफ्ता -रफ्ता
ये सोच घबराता हूँ
न संभाल पायी तो
किधर जाएगी ज़िंदगी
रफ्ता - रफ्ता

इस सोच मे
लेकिन की परिधि मे
संपूर्णता का अहसास खत्म हुआ
अपने होने न होने का
आभास खत्म हुआ
मैंने वाक्य कुछ और कहा
उसने बयां कुछ और किया

रो लेने दे ज़िंदगी के हासिए
जिस्म घसीटता सा लगने लगा है
हर बार गांठ बांधता हूँ
फिर अपने बच्चे का चेहरा
बाँचता हूँ --------
लेकिन की परिधि मे ------------------

गुथथम गुत्था हुए जा रहे शब्दो मे
कई दिनो से पराग तलाश रहा मन
कुछ रिश्तों की फरमाइश थी
कुछ गैरों की आजमाइश

अनामिका का उफ्हार भी
क्रोधित है
संचित ज्ञान का ही अम्बार था अंदर
भौतिकता का परिवेश न था
नैतिक मूल्यों की परवाह कहाँ थी

कुछ रिश्तों की फरमाइश थी
कुछ गैरो की आजमाइश
मैंने वाकया कुछ और कहा
उसने बयां कुछ और किया

  गुनेश्वर

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