Tuesday, 2 July 2013

मैं मित्रों की महफिल मे बैठा

मैं मित्रों की महफिल मे बैठा
एक आवारा पत्र
तुम सम्बन्धों की सीमाओं मे
रहती यत्र तत्र

... मैं पाहून की गुमशुदगी से
विचलित सत्र
तुम सुखद जीवन का आनंद
लेती सर्वत्र

मैं रोजनामचे का रेज़गार
नही खनकता है व्यवहार

तुम बगिया मे खिलती
प्रफुल्लित फूलों का सत्व

मैं ठेकेदारों के ठेके मे रहता
भत्ते का बुखार
तुम लिपस्टिक का संस्कार

मैं ईटों की मानिंद तप्त रक्त
तुम पर मर जाऊँ नहीं मेरा वक्त

मैं घर्षण की धुरी मे घिसता दंड
तुम हो श्रिंगार मे लिपटी प्रचंड

मैं माता पिता का इकलौता तंत्र
तुम गिद्धों मे घूमती
गद्दों की आशा मे पढ़ती मंत्र

मैं मजबूरी का सत्व शीलालेख
हो सकता है तुम भी मजबूरी
का बहू-उपयोगी आलेख|||

यत्र तत्र सर्वत्र ही पढ़ा जाता है तुमको
हासिए पर खड़ा किया जाता है मुझको

मैं मित्रों की महफिल मे बैठा
एक आवारा पत्र
तुम सम्बन्धों की सीमाओं मे
रहती यत्र तत्र

गुनेश्वर

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