मुझ प निगाह रख
मैं अल्लाह के घर
यूँ ही न चल जाऊँ
कैसे छोड़ जाऊँ मैं
तेरी उन यादों को
... प्रेम के इरादों को
ख़ाब का तिलस्म
अभी टूटा कहाँ है
की मैं भूल जाऊँ
ठितुरती देह पर
जो तूने डाला था
दुपट्टा गर्मी का
और कोहरे मे खड़ी
खुद ठिहुरती रही,,,,,,
चाय की इक चुस्की
तरो-ताजा हो गया
वो मेरा बेजान जिस्म
और वो तेरा भागकर
छुप जाना बादल की
ओंट मे और आब की
किरने बिखेरना
लीलल्हा तेरे इन किरणों मे मैं जिंदा रहूँ
------------------------------ -----------------------आमीन
गुनेश्वर
मैं अल्लाह के घर
यूँ ही न चल जाऊँ
कैसे छोड़ जाऊँ मैं
तेरी उन यादों को
... प्रेम के इरादों को
ख़ाब का तिलस्म
अभी टूटा कहाँ है
की मैं भूल जाऊँ
ठितुरती देह पर
जो तूने डाला था
दुपट्टा गर्मी का
और कोहरे मे खड़ी
खुद ठिहुरती रही,,,,,,
चाय की इक चुस्की
तरो-ताजा हो गया
वो मेरा बेजान जिस्म
और वो तेरा भागकर
छुप जाना बादल की
ओंट मे और आब की
किरने बिखेरना
लीलल्हा तेरे इन किरणों मे मैं जिंदा रहूँ
------------------------------
गुनेश्वर
No comments:
Post a Comment