Monday, 1 July 2013

क्या करूँ

तथाकथित समाजसेवी संस्थाए जो बच्चो से
व्यभिचार करवाते हैं और उनके अंगों के बड़े बड़े लोगों को
बेच देते हैं ,,, समाचार पत्रों मे कभी पढ़ा था और उसके बाद
पूरी भड़ास कुछ इस रूप मे निकली ::

क्या करूँ
मेरे घर की चांदनी
उदास हो गई

बहुत प्यार आता है
बहुत सी बाते करती है
कहती है
सूरज लाल ही क्यों है
चन्द्रमा रात मैं ही क्यों

डाल पे बैठी चिड़िया को
घर क्यों नहीं बुला लेते
बारिश मैं

सुबह का अख़बार
दिन भर का समाचार
के क्या मायने

क्यों सब खेलते है
मैं नहीं

माँ [मदर टेरेसा]
आज कल नहीं दिखाई देती

नीता भी दुबकी दुबकी सी है
मोहन भैय्या खेलते नहीं

अपने घर के चारो तरफ
बहुत सारे अंकल आने लगे हैं
इतने लोग एक साथ क्यूँ
आने लगे अचानक

मुझे भी अंकल ने एक मीठी दी
और कुछ पूछा मुझसे
एक और अंकल ने
मुस्कुराने के लिए कहा
बगल मैं खड़े होकर

और सब चले गए

राकेश भैय्या सब से बड़े भैय्या
नुपुर दीदी को कुछ बताने लगे
दीदी उदास हो गयी
तो
मै भी उदास हो गयी
क्या करूँ
मेरी चांदनी उदास हो गयी

क्या बताया राकेश भैय्या ने

मैंने बड़े प्यार से पूछा

भैय्या ने कहा
हमारे हिस्से की रोटी
उन्होंने छीन ली
क्यूँ भैय्या ऐसा क्यूँ किया ?

हमसे ज्यादा भूखे हैं
वो चांदनी बेटा

बेटा तैयार रहना
अब हमारे मांस की बारी है
घबराना नहीं बेटा
हमें अपने बड़ो की इज्जत करनी है

हमारे कोई न कोई अंग बेकार है
कुछ और अंग ले जायेंगे
हमारे सम्मानीय बड़े लोग

मत घबराना बेटे

अपना गुनेश्वर

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