।।मेरी लाज रख लेना बच्चों ।।
बूढी हड्डियों की ठिठुरन
अब और नहीं सहा जाता
तुम्हारी उँगलियों की
कमी महसूस होती है
माँ भी देहरी पर बैठी बैठी
तकती है और देखती है
कंही दूर चौपाल से उठते धुल
मैं किसी गाड़ी की आवाज
पल्लू माथे पर रख, पलट जाती
है घर अंदर
दिए बाती का टेम जो हो गया
अब आटा गुथा नहीं जाता
आजकल चिला ही बना देती है
रात भर मेरा हाथ थामे
मुझे दिलासा देती है
साथ साथ चलेंगे कंही भी
एक डर सा बैठ गया है
और उसका डर मुझे
सुनाई देने लगा है ।
"पता नहीं कब"
मेरे बाद ---------?
मेरी लाज रख लेना बच्चों
गुनेश्वर
बूढी हड्डियों की ठिठुरन
अब और नहीं सहा जाता
तुम्हारी उँगलियों की
कमी महसूस होती है
माँ भी देहरी पर बैठी बैठी
तकती है और देखती है
कंही दूर चौपाल से उठते धुल
मैं किसी गाड़ी की आवाज
पल्लू माथे पर रख, पलट जाती
है घर अंदर
दिए बाती का टेम जो हो गया
अब आटा गुथा नहीं जाता
आजकल चिला ही बना देती है
रात भर मेरा हाथ थामे
मुझे दिलासा देती है
साथ साथ चलेंगे कंही भी
एक डर सा बैठ गया है
और उसका डर मुझे
सुनाई देने लगा है ।
"पता नहीं कब"
मेरे बाद ---------?
मेरी लाज रख लेना बच्चों
गुनेश्वर
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