Monday, 1 July 2013

अपने अधरों को खोलो

अपने अधरों को खोलो
कुछ मीठे प्यारे शब्द तो बोलो
किस बगिया कि कली हो
किसके चौखट पर पली हो
सुंदर हो सुसंस्कृत हो
फिर किसके द्वारा तिरस्कृत हो
अपने अस्तित्व को जानो
वक्त को पहचानो
सृष्टि का तुम ही आधा सच हो
तुम नारी हो देवी हो
पूजी जाती हो
फिर क्यों घबराती हो
सिमटो मत गमले मे गुलाब कि तरह
विस्तृत हो , विस्तार दो
अपने सर्वस्व को फिर से नया आकार दो
जब तक आदमी का न होगा, दंभ खत्म
तब तक तुम्हारा यू ही होता रहेगा शोषण और दमन

  गुनेश्वर

No comments:

Post a Comment