Monday, 1 July 2013

सुबह खोया खोया सा

सुबह खोया खोया सा
मन उदास था
कुछ दिन से
रहबर की ख़ामोशी भी
अंदर के आवेग को
कम करे है ।

निरुद्देश्य भटकन था
मन के भ्रमित मायाजाल में
रेगिस्तान में धुप छाँव मन

आवश्कताओं की फेहरिस्त
पाहून के लिए समर्पित मनोभाव
आवश्कताए और पाहून ?

अलमीरा में पेपर के निचे
कुछ खोजता मन
दोनों को दे सकूँ
सम्पूर्णता

दिन गुजरे, महीने
और कई साल
पर रहबर ने कभी
शिकायत न की
जिन कपड़ो में
आई थी उसमे
एक दो और जुड़े
बस !!!!
कुछ तीज त्यौहार

इस दौरान कई रिश्ते
कट गए और छंट गए

सानिध्य सुख से वंचित
कोलाहल था अंदर- बाहर
बच्चों की दहलीज़ लांघने
की उम्र हो चली
और अपना निचुड़ा तन
बिटिया को मौलिक अधिकारों
से वंचित कर
लीन हो गए अपने अपने
दोजख में
कितनी आत्म ग्लानी
पर घबराता मन
क्योंकि नई सोच का
मानदंड परिवर्तन लिए है
और बिटिया दहलीज़ पर
कुछ खो दूँ ऐसी कोई
प्राप्ति न थी
जो थी, उसकी मौलिकता का
अपहरण कर रख्खा
मान दंड परिवर्तन का
और घबराता मन
सुबह खोया खोया सा
मन उदास था

गुनेश्वर

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