Monday, 1 July 2013

मन का रोद्र रूप

मन का रोद्र रूप
तन कुह्म्लाया सा
सिमटा सा तन
मन भरमाया सा

कासे कहूँ
कैसे कहूँ

अंक पाश में भर
कमलिन की बाँहे
स्वप्नों की साँझ लिए

छू मंतर हो जा
कह जाएँ एसी
जुबान लिए
जो मेरे अपने

सहमा सहमा सा
बोझिल पलकों में
एक आस लिए

कासे कंहूँ
कसे कहूँ

सुख चूका
अंदर का आवेग
प्रतिपल
बच्चे का मन होता जा रहा
पर मेरे उम्र दराज
बचपन को
वात्सल्य नहीं

बचपन तो हेय नहीं
बच्चों का
फिर मेरा यह बचपन
क्यूँ हेय हुआ

कैसे मानु
मैं गुरु न बन सका
उनके बचपन का
कैसे मानु मैंने
जो दिया वो
कमतर था

मन का रोद्र रूप
तन कुह्म्लाया सा
सिमटा सा तन
मन भरमाया सा

खुली खुली बांहों में
मैंने उनका बचपन जिया
पकड़ उगलियाँ उनकी
मंदिर मस्जिद की देहलीज़
छुआ

दिया हर उत्तर उनकी
नन्ही बातों का
कई बार उन्होंने
अपनी झूठी बातों पर
" माँ कसम" , कहा
और मैंने उसे भी
चुपचाप सहा

Guneshwar

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