Monday, 1 July 2013

खोल मन की परते

खोल मन की परते
बहने दे सारा कलुषित
वितृष्णा सा यदि हो रहा है जीवन |

कुछ तो बचा ले अपने लिए
ताकि जी जाये बचे हुए दिन
खोल मन की परते ---------
बहने दे सारा कलुषित

उस सोपान को तो जी लिया
अच्छा बुरा जो भी, जैसा भी
फिर चाहता हूँ जीना अपना बचपन
चाहता हूँ, तुम सब भी जी लो
अपना अपना बचपन
खोल मन की परते ---------
बहने दे सारा कलुषित

बदल डाल अन्दर के उन पुतलों को
जो भयभीत कर रहें हैं
कर किनारा
चल निकल पड़
कुछ दूर धुंध ही सही
उसकी तपन से धुंध भी छट जायेगा

Guneshwar

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