Tuesday, 2 July 2013

जिस्म की शेरवानी मे



जिस्म  की शेरवानी मे
मजहब का समान नहीं रखता
हिन्दू और मुस्लिम का
अलग अलग ईमान नहीं रखता
ईश,खुदा,परवरदिगार,अल्लाह,नानक
इसी वतन की मिट्टी हैं
इन्हे अलग अलग करने का मैं  
इंतेजाम नहीं रखता

हैं बहुत  “”” कट्टर‘‘’“”” यहाँ
जो भोली जज़्बातों को रोंदते हैं
कर अलग कौम को, हाँथ पोंछते हैं

चन्दन सी संस्कृति और सभ्यता
का कर विसर्जन
ये अपनी अपनी अंटियों मे आजकल
मुद्रा खोंचते है

सफेदपोश मक्कारों की
यहाँ तुतियाँ बोलती हैं
नतमस्तक होता आम
हैं बेदम और बेदाम ::::

दो वक्त की रोटी के
लिए पसीने से लथपथ

वक्त का
मजहब नहीं होता
रोटी  का भी नहीं
पसीने का भी नहीं

ईश,खुदा,परवरदिगार,अल्लाह,नानक सब पसीना है
बहेगा तो मिलेगा
नहीं तो भूखा रहेगा

पसीना नहीं जानता कौम {{{{{{{ न तो }}}}}}}}
जिस्म  की शेरवानी मे
मजहब का समान रखता {{{ दो रोटी }}}} बस
गुनेश्वर  

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