Monday, 1 July 2013

खनक गिन्नी की

खनक गिन्नी की
लुभाती है, खनक गिन्नी की

मन मचलता है,

तन दहलता है “
मौन का समीकरण
बदलता है :::
सुन --------------खनक गिन्नी की

देह सुलगता है
आह बिलखता है
फुटपाथों पर
शील बिकता है
सुन----------------खनक गिन्नी की

वसीयत चलता है
चलते चलते रुकता है
फिर चलता है
वकील भी बिकता है
सुन---------------खनक गिन्नी की

झोपड़ी रोता है
नहीं झाड़ू-पोछा
होता है
बूढ़ा माधव
जार जार रोता है
जब से सुना दी
उसने बेटे को
------------------खनक गिन्नी की

मंदिर अस्त-व्यस्त है
पुजा-पाठ भी त्रस्त है
पुजारी मदिरापान मे
मस्त है,
जब से सुन ली उसने
-------------------खनक गिन्नी की

कोतूहल पाखंडी है
मन भी र-N-डी है
शील पर लार टपकाए
जमीर का दोज़ख उठाए
हर आदमी यहाँ, दोगला
बिकता है
सुन--------------खनक गिन्नी की

भृकुटी तनती है क्रोध उफनती है
कत्ल हो जाता है, सफेदपोश मक्कारों
के कारखानों मे, लपटे नहीं उठती
संघर्ष का साहित्य पेज पलट देता है
टीआरपी की जिज्ञासा भी बिकती है
सुन----------------खनक गिन्नी की

तरुण मानसिकता मनन से परे

चकाचौंध से लिपटता जा रहा

बिकता ही जा रहा
सुन----------------खनक गिन्नी की


गुनेश्वर

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