अब तो अरमानों के मेले हुए हैं अकेले
-अब तो पहचान खो गई फिक्र के तले
जी रहें हैं यूँ ही अधूरी सी ज़िंदगी लिए
परवश हैं हम और रह गए बस हठीले
हमने
सोचा था जी लेंगे हम अब साथ साथ
मुफ़लिसी का जहर पी लेंगे साथ साथ
--तर्को का व्यवहार न करेंगे हम कभी
-जीवन के मायने मिलकर गहेंगे सभी
पर
सभ्यता का अवमूल्यन होने लगा है
मुहब्बत भी रूठा-रूठा सा खोने लगा है
आवश्यकताओं का संघर्ष डुबोने लगा है
असंतृप्त सा जीवन खुद को ढोने लगा
अपने
परिचय का यहाँ से प्रस्थान हो रहा है
सप्तपदी का भी तो अपमान हो रहा है
अपने “मैं” का ही तो उत्थान हो रहा है
अब नहीं अपना कोई निदान हो रहा है
व्यक्तिगत स्वार्थ ही हमे डुबो रहा है
क्या कहें
अब तो अरमानों के मेले हुए हैं अकेले
अब तो पहचान खो गई फिक्र के तले
गुनेश्वर
-अब तो पहचान खो गई फिक्र के तले
जी रहें हैं यूँ ही अधूरी सी ज़िंदगी लिए
परवश हैं हम और रह गए बस हठीले
हमने
सोचा था जी लेंगे हम अब साथ साथ
मुफ़लिसी का जहर पी लेंगे साथ साथ
--तर्को का व्यवहार न करेंगे हम कभी
-जीवन के मायने मिलकर गहेंगे सभी
पर
सभ्यता का अवमूल्यन होने लगा है
मुहब्बत भी रूठा-रूठा सा खोने लगा है
आवश्यकताओं का संघर्ष डुबोने लगा है
असंतृप्त सा जीवन खुद को ढोने लगा
अपने
परिचय का यहाँ से प्रस्थान हो रहा है
सप्तपदी का भी तो अपमान हो रहा है
अपने “मैं” का ही तो उत्थान हो रहा है
अब नहीं अपना कोई निदान हो रहा है
व्यक्तिगत स्वार्थ ही हमे डुबो रहा है
क्या कहें
अब तो अरमानों के मेले हुए हैं अकेले
अब तो पहचान खो गई फिक्र के तले
गुनेश्वर
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