टोढी के नीचे जब माँ हाथ लगाती थी
कितनी भोली सी सूरत बन जाती थी
गाल पकड़कर जब वह कंघी करती थी
कंघी करते कुछ समझाइश दे जाती थी
अच्छा बच्चा बनकर सब कुछ सुनता
पास बिठाकर उबले चने खिलाती थी
कितनी ममतामई होती थी माँ अपनी
उस वक्त यह बात नहीं समझ आती थी
गुनेश्वर
कितनी भोली सी सूरत बन जाती थी
गाल पकड़कर जब वह कंघी करती थी
कंघी करते कुछ समझाइश दे जाती थी
अच्छा बच्चा बनकर सब कुछ सुनता
पास बिठाकर उबले चने खिलाती थी
कितनी ममतामई होती थी माँ अपनी
उस वक्त यह बात नहीं समझ आती थी
गुनेश्वर
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