Thursday, 2 January 2014

टोढी के नीचे जब माँ हाथ लगाती थी
कितनी भोली सी सूरत बन जाती थी
गाल पकड़कर जब वह कंघी करती थी
कंघी करते कुछ समझाइश दे जाती थी
अच्छा बच्चा बनकर सब कुछ सुनता
पास बिठाकर उबले चने खिलाती थी
कितनी ममतामई होती थी माँ अपनी
उस वक्त यह बात नहीं समझ आती थी
गुनेश्वर

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