सच्चाई जो ओढ़ी उसने,,,,,कहने लगा चुभती है ये
गुनेश्वर
बस अपनी यादों का दर्पण देना,,,,इन्तजार में चेहरा बदल न जाये
गुनेश्वर
गुमनामियों में रख गुनगुनाने लगे हो,,,,फिर वो शौक पुराना निभाने लगे हो
गुनेश्वर
कान्हा मैं हूँ सखा तुम्हारी
मैं तुम पर सब कुछ हारी
न देर करो अब आ जाओ
व्याकुल मन समझा जाओ
चितचोर मन, मोर पंख्धारी
मुख दर्शन दिखला जोओ
खुश है मन का कौन कौन
मुह फेर लेते हो परछाई देख २०
मुझमे ये सच् बचा है अब तक
कैसे गुमराह हो जाते हो,,,,माँ को भी तुम भूल जाते हो
गुनेश्वर
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