Wednesday, 28 August 2013

दुविधा हुई थी बहुत
अपने हिस्से का रोटी देना पड़ा था तुमको
पसीज ही गया था, कातर नजरो को देख
और तुम माँगने न माँगने की सोच में खड़े  
अंगूठे से मिटटी कुरेदते हुए ,,,,,

तुमने नहीं माँगा था मुझसे
मेरे इन्सान होने का सबूत
बस तुम्हारी उन आँखों ने
झकझोरा था मुझे कहीं॥॥

हमेशा तुम्हे देखता था आते जाते
और मैं भी मूक खड़ा हो जाता था
कुछ देने न देने की जद्दोजहद में

मेरी मानसिकता विकृत नहीं थी
और न दया भाव की कोई कमी

चाहता था की तुम्हारे हाँथ न फैले

तुम शालीनता से सम्हाले रहे सच
मैं ही कमजोर पड़ गया था उसदिन
पसीज गया, कातर नजरो को देख
क्षमा करना दोस्त मुझे
तुम्हारी दृढ़ता को झकझोरा मैंने

गुनेश्वर

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