मजबूर
आदत से मजबूर
कायरों की तरह रहता है आदमी
अपनी अपनी ढपली
अपना अपना राग
हक जनता है अपना
पर हक्का-बक्का
रहता है आदमी
ये ढोग नहीं तो क्या है
कोई पारिवारिक ढोंगी है
कोई सामाजिक ढोंगी
कोई व्यवस्था मे रहता है
और व्यवस्थित ढोंगी है
ढोंगी का कोई दिन ईमान नहीं
कह तो दु, इस देश मे
सबसे बड़ा ढोंगी
मत-दाता है
उसे पता सब है, पर भ्रम पाले है
और अपनी जगह से उठकर
नहीं देखना चाहता
और सारे राजनैतिक भिखारी
वोट का भीख मांगते
अपने अपने ढोंग का
खुला प्रचार करते
इनही के आँखों के सामने
और मत-दाता ढोंगियों की तरह
एक नए ढोंगी
राजनैतिक व्यवस्था के लिए तत्पर
निरंतर कई सालों से
उसमे से मै भी एक
तुम भी
वो भी
हम सब , वे सब
क्योंकि हम सब मत-दाता है
गुनेश्वर
आदत से मजबूर
कायरों की तरह रहता है आदमी
अपनी अपनी ढपली
अपना अपना राग
हक जनता है अपना
पर हक्का-बक्का
रहता है आदमी
ये ढोग नहीं तो क्या है
कोई पारिवारिक ढोंगी है
कोई सामाजिक ढोंगी
कोई व्यवस्था मे रहता है
और व्यवस्थित ढोंगी है
ढोंगी का कोई दिन ईमान नहीं
कह तो दु, इस देश मे
सबसे बड़ा ढोंगी
मत-दाता है
उसे पता सब है, पर भ्रम पाले है
और अपनी जगह से उठकर
नहीं देखना चाहता
और सारे राजनैतिक भिखारी
वोट का भीख मांगते
अपने अपने ढोंग का
खुला प्रचार करते
इनही के आँखों के सामने
और मत-दाता ढोंगियों की तरह
एक नए ढोंगी
राजनैतिक व्यवस्था के लिए तत्पर
निरंतर कई सालों से
उसमे से मै भी एक
तुम भी
वो भी
हम सब , वे सब
क्योंकि हम सब मत-दाता है
गुनेश्वर
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