Thursday, 11 July 2013

रेत

रेत
रेत हूँ , मैं रेत की तरह नजर आऊँ
कंक्रीट मे पैवस्त हो गुम सा गया हूँ

नदियाँ मटमैली हो गई हैं
जल अब निथरता भी नहीं

बहाव नदियों का
सवेदनहीन हो रहा
काई की परतें दिखती है
मिट्टी का कटाव इतना
की मैं दब सा गया हूँ
तुमने रोका सारा जल
जो मुझसे, हँस बोल लेती थी

और दूसरी तरफ मैं कण कण सिसकता रहा
चट्टानों के बीच फंसा
ज़िंदगी जब तुम पर
हुई हावी ,,, तुमने खोला अपनी मर्जी का पट
और मुझ पर इतने आवेग से
प्रहार किया ,,, और मैं क्षत-विक्षित

सिसकता हुआ जिंदा तो था
चट्टानों के बीच पर तुमने दूर कर दिया
मैं भी आ पड़ा पुराने रेत के कणों के पास
लुढ़कता हुआ ठोकर खाता हुआ

रेत कभी वृद्ध होता है क्या ???
शायद वृद्ध रेत हो जाता है !!!!!!!!!!!

रेत हूँ , मैं रेत की तरह नजर आऊँ
कंक्रीट मे पैवस्त हो गुम सा गया हूँ

गुनेश्वर

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