Wednesday, 28 August 2013

आस्था चरमराती है
एहसास मर जाते हैं

???????

ये मन सतरंगी रे >>>>>>>>>>

खोने को कुछ भी नहीं
स्वार्थ असभ्यता की रीढ़ है

झुक जाओ बस,,, और यकीं करना
…………………………………… हाँथ फ़ैलाने में

हर सुबह नई चीज
पुरानी लगने लगेगी

रीढ़ मेरी है ,,, सोच मेरी है ,,,
संस्कृति का क्या ????????
सभ्यता जाओ आँख मुंद लो तुम

ये मन सतरंगी रे ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

गुनेश्वर

No comments:

Post a Comment