Monday, 1 July 2013

आस्था जो बिखरती है

आस्था जो बिखरती है
नीड़ टूटता है फूल मुरझा जाते हैं
नेमते उसकी सारे भूल जाते हैं

मनुज हैं माँगने के लिए
उसने झोली मे सारा कुछ डाला
ज्ञान विज्ञान साहित्य और सत्व
फिर भी कुछ न कुछ चाहिए हमे

अपनी सभ्यता और संस्कृति
दोहन और रोदन हमने किया
पर उछाल कर लफ्ज डाल दिया
उसके पाले मे ,और मूक हो गए
हमे कुछ नहीं पता ,,,

शायद हम सारे मानसिक व्यभिचारी हैं

अंतेर्द्वंद की अधखुली खिड़की से झाँक
शीतल हवाओं मे ....,,, आलिंगनरत्त
देह से ज्यादा नहीं सोचना चाहते
लूट लेते हैं स्त्रीत्व प्रकृतिक आपदा के
घोर अंधकार मे भी ,,,

और उतर पड़ते हैं ,,,, साधू का वस्त्र धारण किए
------------------------फिर से माँगने के लिए

और लाशों के बीच बैठ सात्विक भोजन के प्रति
झाँकते ,,, ताकते ,,, लूट लेने के लिए आतुर

--------------------क्योंकि अन्दर खुद के प्रति आस्था लुप्त हो चुकी है ||||

उसकी घड़ी ,, उसका बटुआ , उसकी पाजेब , कान का बूँदा , चुड़ियाँ
रुपए पैसे दौलत ::::: चलो अब चले <<<<

मरने वाल हमे कोसता है या नहीं ,,, क्या फर्क पड़ता है ,,,
कल के लिए बहुत कुछ इकठ्ठा हो गया

आस्था जो बिखरती है
नीड़ टूटता है फूल मुरझा जाते हैं
नेमते उसकी सारे भूल जाते हैं

गुनेश्वर

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