Thursday, 2 January 2014

छू कर महसूस जो हुआ
मेरा तन ही तो है
यकीन जो हो ही जाए
मेरा मन ही तो है

कमसिन सी हूँ, बेहद हसीन भी
कोमल सी हूँ, मैं नाजनीन भी

दिलकश हैं ये गेसू, चंचल सी हैं आँखें
लरजते हुए लबों मे लुभावनी सी हँसी

खोने के लिए ये काफी है
ज़िंदगी की शाम हैं यहीं
मैं ही तो मुहब्बत हूँ तिरी

यादों मे अंगड़ाई लूँ कभी
रौशन हो जाए
एक हँसी झिलमिल सी
तेरे लबों पर

मैं ही सुकून हूँ ये जान ले
या फिर आ मेरी जान ले